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समस्याओं का जाल

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मैं इस देश की एक आम नागरिक हूँ और हर आम आदमी की तरह मैं भी इस देश की अव्यवस्थाओं को लेकर बहुत चिंतित हूँ. स्कूलों में शिक्षक ठीक से पढ़ाते नहीं, सरकारी बाबू अपनी सीट पर मिलते नहीं – मिल गए तो बगैर लिए-दिए काम नहीं करते, ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता मिल चुकी हो. सड़क पर चलना भी दूभर हो रहा है, सुबह हो या शाम बस जाम ही जाम. अगर बात करें गंदगी की तो गंदगी के समक्ष स्वच्छता अभियान भी हांफ रहा है. हर चुनाव के बाद लगता है कि कुछ बदलेगा पर कोई भी सुधरने का नाम नहीं ले रहा, सोचती हूँ वोट डालना ही छोड़ दूँ. मंहगाई भी बढती जा रही है, घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है. अखबार पढने बैठती हूँ तो वहां भी रोज चोरी, हत्या, गुंडागर्दी, बलात्कार की ख़बरें ही भरी होती हैं. इन अव्यवस्थाओं से चिंता भी होती है तो क्रोध भी आता है पर मैं कर भी क्या सकती हूँ? इन अव्यवस्थाओं के कारण लगता है जैसे मेरी खुशियों को ही ग्रहण लग गया है.

दैनिक समस्याओं को लेकर और अपने आपको जागरूक कहने वाले कमोबेश हर आम आदमी का यही डायलाग है और शायद इसीलिए हाल ही में वैश्विक स्तर पर खुशी के सूचकांक यानि Happiness Index में शामिल 156 देशों की सूची में भारत का स्थान 118 वां है. इसमें कोई दो राय नहीं कि परिवार समाज और देश में समस्याएँ तो अनेकों हैं पर समस्याओं को दोष देने के पहले क्या कभी अपने आपको हमने आईने के सामने खड़ा किया है?

आइये समझने की कोशिश करते हैं.

मैं एक सरकारी बाबू हूँ, कुछ लोग मेरी कुर्सी को मलाईदार कहते हैं, अरे भई सरकारी वेतन में आजकल कहाँ गुजारा होता है. चलिए आपकी बात मानकर मैं घूस लेना बंद कर दूंगी, पर दूसरे तो नहीं करेंगे. ऐसे में मेरे परिवार वाले तो मुझे बुद्धू ही बोलंगे और हाँ एक बात और मैं किसी से जबरदस्ती तो मांगती नहीं हूँ. यह तो कर्म का मंदिर है जहाँ लोग श्रद्धा से चढ़ावा चढ़ा जाते हैं तो इसमें बुराई क्या है. जब देने वाला और लेने वाला दोनों ही राज़ी है तो आपको क्या तकलीफ है? एक बात और मुझे अपने से ऊपर वालों का भी तो ध्यान रखना पड़ता है. घोटाले करने वालों ने विदेशों में लाखों करोड़ जमा करा रखा है और आप मेरे जैसों के ऊपर ऊँगली उठा रहे हैं. देश में घोटाले के समंदर के समक्ष मेरी रिश्वतखोरी तो बस एक बूंद पानी के समान है और ये भी तो देखिये कि इस लेन-देन काम आसान और तेज गति से होता है, नहीं तो चक्कर काटते रह जाइयेगा दफ्तर के.

मैं एक शिक्षिका हूँ, आपलोग बेकार में मेरे ऊपर आक्षेप लगाते हैं कि मैं क्लास में ठीक से नहीं पढाती और बच्चों को ट्यूशन के लिए बाध्य करती हूँ. अब आप ही बताइए जब कक्षा में इतने ढेर सारे बच्चे हों तो हर बच्चे पर ध्यान कैसे दिया जा सकता है. इसीलिए जब कोई बच्चा ट्यूशन के लिए के लिए घर आना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है. इससे दो फायदे हैं पहला ये कि कोई बच्चा मुझसे ट्यूशन ले रहा है तो प्रैक्टिकल में नंबर भी तो उसी के अच्छे आयेंगे और दूसरा ये कि वह कक्षा में जो प्रश्न हल नहीं कर पाता उसे मैं वहां पर समझा सकती हूँ. इसमें गलत क्या है, सभी स्कूलों में ऐसा ही होता है, आजकल सरकारी वेतन में होता ही क्या है. और वैसे भी जब बच्चा इतना डोनेशन देकर एडमिशन ले सकता है तो फिर ट्यूशन भी तो पढ़ सकता है, इसमें बुराई क्या है? बाकी आपकी मर्जी, आपका बचह फेल हो जाए तो मुझे दोष मत दीजियेगा कि गलती हो गयी ट्यूशन ना कराकर.

मैं एक व्यापारी हूँ. कुछ लोग कहते हैं कि मैं सरकार की कर चोरी करती हूँ, मिलावटखोरी करती हूँ. जहाँ तक कर चोरी की बात है तो ऐसा कहने से पहले क्या आपने सोचा कि मुझे हर महीने कितना सुविधा शुल्क देना पड़ता है. कोई ना कोई इंस्पेक्टर आ ही जाता है. और तो और बिजली का बिल भी तो कम करवाना पड़ता है. अब रही बात मिलावट की तो आपको बता दूँ कि हालिया सरकारी रिपोर्ट में देश में करीब सत्तर फीसदी दूध मिलावटी बिकता है और हाँ खोये, सरसों के तेल आदि खाने की चीजों में मिलावट तो आप रोजाना अख़बारों में पढते ही हैं. आपको क्या लगता है कि ये सब मैं ही करती हूँ? खैर छोडिये आपने जो सामान लिया है उसका बिल चाहिए तो बताइए क्योंकि फिर उस पर टैक्स भी लगेगा और कीमत बढ जायेगी. कहा आपने बिल नहीं चाहिए, बहुत बढ़िया इसे कहते हैं समझदारी फालतू में बिल बनवाइए आपका भी नुकसान क्योंकि सेल्स टैक्स और वैट तो आप ही से वसूलुंगी और मेरा भी नुकसान क्योंकि मुझे इन्कम टैक्स भरना पड़ेगा.

मैं अपने परिवार का मुखिया हूँ. रोजाना दफ्तर जाता हूँ और दिन भर मेहनत करके पैसे कमाता हूँ. मेरी पत्नी दिन भर खाली रहती है, उसके पास कोई काम नहीं है फिर भी जब पूछता हूँ तो कहती है कि मेरे पास समय ही नहीं है. अब आप ही बताइये कि भला घर के सदस्यों या मेहमानों के लिए खाना बनाना, घर में झाड़ू-पोंछा और साफ़-सफाई करना, बच्चों को तैयार करना, सबके ड्रेस का ध्यान रखना और जब घर पर कोई नहीं हो तो घर की चौकीदारी भी करना. अरे भाई ये तो उसकी ड्यूटी है, ये सब भी कोई काम है जिनको गिनाया जाए गृहिणी का यही तो धर्म है. उसे अगर मेरी बातें बुरी लगती हैं तो वो भी कमाना शुरू करे. पर हाँ वो ये ना भूले कि मैं पुरुष हूँ इसलिए उसे मेरी हर बात माननी ही पड़ेगी. वैसे ही रहना होगा जैसा मैं चाहूँगा, वैसे ही कपड़े पहनने होंगे जैसा मैं चाहूँगा, उसी से बात करनी होगी जिससे मैं चाहूँगा, वहीं जाना होगा जहाँ मैं चाहूँगा. शास्त्रों में भी तो लिखा है कि पति परमेश्वर होता है. मेरी कोशिश तो यही रहती है कि वो बातों से मान जाए नहीं तो तरीके तो मुझे और भी आते हैं. अब आप लोग ही निर्णय करें कि क्या यह घरेलू हिंसा है, बिना बात का बतंगड बनाती है मेरी पत्नी भी.

माफ कीजियेगा मैं थोडा लेट हो गयी. क्या करूँ शहर में आजकल जाम की बड़ी समस्या है, बड़ी मुश्किल से कहीं उलटी तो कहीं सीधी दिशा का मार्ग पकडकर आ पायी हूँ, यातायात सिपाही के हाथ का भी ध्यान नहीं रखी जब उसके साथी ने रोका तो पूरे पचास रूपये दी हूँ. क्या बताऊँ, ऐसा लगता है कि चौराहे का मतलब कन्फ्यूजन है, पता ही नहीं चलता कि कौन किधर जायेगा. वैसे हमारे शहर में एक बात अच्छी है आप जहाँ चाहें इशारा कर दीजिए बस हो या ऑटो वहीं रुक जायेंगे भले ही कहीं भी रोकने से जाम ही क्यों ना लग जाए लेकिन लोगों को तो आराम है एक मिनट तो लगता है चढ़ने-उतरने में. मैं तो खरीदारी के लिए भी जब जाती हूँ तो कोशिश होती है कि सड़क पर ही कहीं जगह देखकर अपनी कार या स्कूटी खड़ी कर दूँ. भला पार्किंग तक कौन जाए और फिर वहां तो पार्किंग शुल्क भी देना पड़ेगा. रही बात जाम की तो यह सिर्फ मेरी वजह से ही थोड़े लगता है, दुकानदार फूटपाथ तक सामान फैलाये रखते हैं, फूटपाथ दुकानदार सड़क पर बैठते हैं और खरीदार सड़क पर पार्किग कर सामान खरीदते हैं, अब आप ही डिसाइड कीजिये कौन जाम लगाता है.

मैं एक डॉक्टर हूँ, बताइए क्या तकलीफ है. मुझे पृथ्वी पर दूसरा भगवान भी कहते हैं फिर भी आपको लगता है कि मैं कुछ गलत कर रही हूँ. मेरी पढ़ाई पर लाखों रूपये खर्च हुए हैं इसलिए थोड़े ही कि मैं समाजसेवा करुँगी, चिकित्सा विज्ञानं की पढ़ाई की हूँ तो चिकित्सा करके ही तो कमाऊंगी. मेरा सिद्धांत स्पष्ट है. मेरी प्रैक्टिस बहुत अच्छी चल रही है सिर्फ आपकी बिमारी सुनने के लिए चार सौ रूपये फीस लेती हूँ. अगर आपको सर्दी, जुकाम या खांसी है तो जानते हैं कि यह किसी भी गंभीर बिमारी का लक्षण भी हो सकता है. कुछ टेस्ट लिख रही हूँ इसको गली के मुहाने वाली पैथोलोजी में ही टेस्ट करवाइयेगा, जब तक रिपोर्ट नहीं आती तब तक के लिए कुछ दवाएं लिख देती हूँ, नीचे काउंटर से खरीद लीजिए. फिलहाल इन दवाओं को लीजिए रिपोर्ट आने के बाद फिर देखती हूँ और हाँ टेस्ट जल्दी करवा लीजियेगा क्योंकि आपकी फीस तीन दिनों तक ही मान्य रहेगी. अरे आपको तो पसीना भी आ रहा है, ये तो बड़ा ही सीरियस केस है, शरीर का सारा पानी निकला गया है, ऐसा कीजिये आज एडमिट हो जाइये ड्रिप लगानी पड़ेगी, पैथोलोजी वाला वहीं से आपका सैम्पल ले लेगा.

मैं एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हूँ. क्या आपको को पता है कि देश के माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छ भारत अभियान चला रखा है. इस अभियान से मैं भी पूरी तरह से जुड चुकी हूँ. कल मैंने अपने मोहल्ले वालों के साथ मिलकर सफाई अभियान भी चलाया था, अख़बार में मेरी फोटो भी छपी थी, देखा था आपने? अब रोज-रोज तो मोहल्ले की सफाई मैं कर नहीं सकती इसलिए मैं अपने घर की अच्छे से सफाई करके संतुष्ट हूँ. कूड़ेदान नहीं होने से घर का जो कूड़ा निकलता है उसे सड़क पर फेंक देती हूँ. ऐसा नहीं है कि कूड़ेदान था ही नहीं एक्चुअली कोई कूड़ेदान ही उठा ले गया. भईया ये इंडिया है यहाँ प्याऊ हो या ट्रेन का एसी डब्बा, लोटे को भी चेन से बांधकर रखना पड़ता है, कूड़ेदान भी कोई ले गया होगा. नगरपालिका वालों को ध्यान रखना चाहिए. लेकिन मोहल्ले के लोग भी अजीब हैं, मेरा देखा-देखी वे सब भी वहीं कूड़ा फेंकने लग गए. कूड़े का ढेर लगता जा रहा है. लोग रहते हैं तो कूड़ा तो फैलेगा ही और इसे उठाने की जिम्मेदारी सफाईवाले की है, रही बात इधर-उधर थूकने की तो, भईया सड़क पर थूकदान तो बना नहीं, क्या करूँ जहाँ ठीक लगता है वहां थूक देती हूँ.

अरे मेरी भी तो सुनिए, मैं भी एक आम नागरिक हूँ, मुझे मालूम है कि आप सभी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था पर देखते-देखते आक्रान्तों ने इसके पर क़तर दिए. पहले इस कवायद में बाहरी लोग और काले धन के कुबेर शामिल हो गए हैं और अपनी नासमझी से थोडा-मोड़ा योगदान मैं भी कर देती हूँ. इसीलिए जब विश्व बैंक अपनी रिपोर्ट में यह कहता है कि गरीब देशों में सबसे अमीर देश भारत है तो मैं संतुष्ट हो जाती हूँ. मुझे पता है कि इन सबके पीछे जहाँ भ्रष्टाचार एक मुख्य कारण है तो वहीं विदेशी कंपनियों के प्रति मेरा मोह भी इसे मजबूती प्रदान करता है. भ्रष्टाचार और घूसखोरी को लेकर मैं तोकुछ कर नहीं सकती क्योंकि इस मामले में तंग आकर माननीय उच्चतम न्यायलय ने स्वयं ही टिप्पणी कर रखी है कि क्यों ना घूस के रेट तय कर दिए जाएँ पर रही बात विदेशी के प्रति मेरे मोह की तो उससे देश की गरीबी का क्या लेना-देना. मेरी तो आदत है विदेशी कंपनी के टूथपेस्ट से दाँत साफ़ करने की, विदेशी कंपनी के साबुन से नहाने की, विदेशी कंपनी के शैम्पू बाल धुलने की, गोरी दिखने के लिए फेयरनेस क्रीम लगाने की, भूख लगने पर पिज्जा खाने की और प्यास लगने पर कोल्ड ड्रिंक पीने की. मुझे पता है कि ये सब शून्य तकनीकी से बनी विदेशी कंपनियों के सामान हैं परन्तु मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है, इससे तो मेरी शान बढती है और वैसे भी लोकल सामान का क्या भरोसा. वैसे आपको एक बात बता दूँ कि मुझे पता है कि फेयरनेस क्रीम, कोल्ड ड्रिंक, पिज्जा ये सब मेरी किडनी और लिवर खराब कर सकते है पर मैं इस बारे में सोचती नहीं.

ओ हो इतना सब कुछ पढ़कर तो लगता है कि आप सब बहुत चिंता में पड़ गए हैं. वैसे भी आपके माथे की लकीरें बता रही हैं कि आपका कोई भी काम समय से नहीं हो पा रहा था अब तो और भी बिगड़ने की नौबत आ गयी है. परिवार वालों का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता, बेटी की शादी में रोडे लग रहे हैं, बहू कहना नहीं मानती और बेटा हाथ से निकलता जा रहा है. आपके हाथ और माथे की लकीरें कह रही हैं कि आप और आपका परिवार बहुत बड़ी विपदा से घिरे हुए हैं, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह समय काल आप पर बहुत भारी गुजरने वाला है. राहु और केतु दोनों ही नाराज हैं और शनि भारी पड़ रहा है. ग्रहों की शांति के लिए शीघ्र ही हवन करवाना होगा, दान करना होगा.

मैं इस देश की नेता हूँ आपकी समस्याओं के निराकरण और इन तमाम अव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के लिए मुझे आपका वोट चाहिए. दान का बड़ा महत्व है इसलिए इन चुनावों में आप अपने-अपने मतों को मुझे दान कर दीजिए. वैसे यदि आप इन अव्यवस्थाओं के नाम पर मुझे वोट नहीं देना चाहते तो मेरे पास वोट मांगने के और भी बहुत से हथकंडे हैं. आपने लूडो तो खेला ही होगा. जिस प्रकार उसमें आगे बढ़ने के लिए पांसे का इस्तेमाल करते हैं उसी प्रकार मैं भी आपका वोट लेने के लिए अलग-अलग तरह के पांसे फेंकती हूँ जिसमें जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, सड़क, बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, आरक्षण, मंदिर-मस्जिद और भी बहुत कुछ शामिल है. आपने कुछ कहा शायद, जी हाँ कन्हैया, रोहित वेमुला और अख़लाक़ भी हैं मेरे उसी पांसे का हिस्सा हैं. पहले मैं भारत माता की जय बोलकर खुद में और आपमें भी जोश भारती थी पर अब तो मैंने भारत माता की जय के नारों को भी अपने पांसे में ही शामिल कर लिया है. आपके वोट से मैं माननीय बन जाउंगी, मेरे पास असीम शक्ति वाली राजनीतिक सत्ता आ जायेगी, इसीलिए मेरा पूरा परिवार चुनाव के मैदान में उतरता है. आपको लगता है कि चुनाव जीतने के बाद मैं आपको भूल जाउंगी, गलत सोचते हैं आप, मैं आपको भूलूंगी नहीं. पाँच वर्षों बाद मैं फिर आपसे इसी प्रकार मिलने आउंगी. चलिए एक बार आप सभी मेरे साथ बोलेंगे – भारत माता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद.

शायद कुछ ज्यादा लिख गयी. अलग-अलग चरित्रों के साथ इस प्रस्तुति के माध्यम से एक कोशिश थी कि हम सब समझ सकें कि आखिर क्यों हमारा देश खुशी के सूचकांक में 118 वें स्थान पर हैं और तलाश सकें अपने भीतर के उन कारणों को जिसके कारण कभी हम स्वयं की खुशी छीन लेते हैं तो कभी अपने से जुड़े किसी और की खुशी में बाधा बन जाते हैं. परिवार, समाज और देश की इन समस्याओं के लिए जिम्मेदारी किसी ना किसी को तो लेनी ही होगी – शायद हर किसी को – क्योंकि अपने इर्द-गिर्द उन समस्याओं का जाल हमने और आपने ही तो बुन रखा है.

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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkukreja के द्वारा
April 25, 2016

 वंदना जी,उत्तम लेख के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभ कामनाएं.

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 25, 2016

    हार्दिक आभार

rajkukreja के द्वारा
April 25, 2016

वंदना जी,अति उत्तम विचारों की अभिव्यक्ति की है.हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाये.

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 25, 2016

    आदरणीया कुकरेजा जी, कोटिशः धन्यवाद. आप सभी की प्रेरणा यूँ ही मिलती रहे.

Bhola nath Pal के द्वारा
April 23, 2016

आपको लगता है कि चुनाव जीतने के बाद मैं आपको भूल जाउंगी, गलत सोचते हैं आप, मैं आपको भूलूंगी नहीं. पाँच वर्षों बाद मैं फिर आपसे इसी प्रकार मिलने आउंगी. चलिए एक बार आप सभी मेरे साथ बोलेंगे – भारत माता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद…………..बंदना जी ! लिखने में कुछ तो कसर रह गई है हालत बहुत ख़राब हैं .साप्ताहिक सम्मान मुबारक हो …………

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 25, 2016

    आदरणीय भोलानाथ जी, सादर धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए. ब्लॉग निश्चित रूप से बहुत लंबा है जब लिखने बैठी और जिस दिशा में भी सोची ऐसा लगा वहीं एक समस्या पहले से मुंह बाए खड़ी है. और मजे की बात ये है कि जो लोग समस्याएं गिना रहे हैं वे स्वयं उसी समस्या के भागीदार भी हैं (शायद मैं भी). किसी भी अव्यवस्था को कोस कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते हम लोग. एक बार पुनः धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
April 23, 2016

आदरणीया वंदना जी, सर्वप्रथम साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई! बहुत अच्छा लिखा है, बल्कि आइना दिखाया है. हमने सोचा था, अच्छे दिन आ गए. लेकिन आपने तो बहुत सारी समस्याएं गिना दी. … पर समस्याओं का होना जरूरी है तभी तो उसके समाधान निकालने के बारे में सोचेंगे. नए नए नेता पैदा होंगे, नए नए नारे गढ़े जाएंगे. यही तो है जिंदगी. नहीं??? सादर!

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 25, 2016

    आदरणीय जे जे सिंह जी, ब्लॉग पर आने के लिए कोटिशः धन्यवाद. सत्य तो यही है कि समस्याओं के निपटान के लिए हमारी उम्मीदें दूसरों से ही रहती हैं जबकि वास्तविकता यह है कि समस्याओं के उत्पन्न होने में हमारी भूमिका कम नहीं है.

ALOK के द्वारा
April 21, 2016

बेहतरीन लेखन के लिए ढेरों बधाइयां. यूँ ही लिखती रहिये क्योंकि जागा हुआ वयक्ति ही सोये हुए लोगों को जगा सकता है.

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 22, 2016

    धन्यवाद

sudhajaiswal के द्वारा
April 21, 2016

वंदना जी बहुत खूब लिखा है आपने, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक के लिए हार्दिक बधाई!

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 22, 2016

    आदरणीया सुधा जी, ब्लॉग पर आने एवं आपकी प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद

ashasahay के द्वारा
April 20, 2016

बहुुत बधाई बंदना  वर्णवाल जी ।समस्याओंको बड़े कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया आपने।सुन्दर आलेख।

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 22, 2016

    आदरणीया आशा जी, प्रतिक्रया के लिए कोटिशः धन्यवाद.

sudhajaiswal के द्वारा
April 20, 2016

वंदना जी क्या खूब लिखा है आपने, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक के लिए हार्दिक बधाई!

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 22, 2016

    पुनः धन्यवाद सुधा जी

Rajiv Kumar Ojha के द्वारा
April 20, 2016

वंदना जी ! आपको साधुवाद। बहुत खू बसूरती से आपने वर्तमान व्यवस्था के विभिन्न घटकों और भ्रष्टों ,भ्रष्टाचारियों की बढ़ती स्वीकार्यता को प्रस्तुत किया है।

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
April 20, 2016

वंदना जी बहुत घनघोर चिंतन ,काश ऐसा आसमान मैं बादल घनघोर हो जाते तो भारतीय जनता पार्टी और देश की चिंताओं को भयंकर वारिश से ओम शांति शांति मिल पाती ………………………………………………………………मैं आपको भूलूंगी नहीं. पाँच वर्षों बाद मैं फिर आपसे इसी प्रकार मिलने आउंगी. चलिए एक बार आप सभी मेरे साथ बोलेंगे – भारत माता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद. शायद कुछ ज्यादा लिख गयी. अलग-अलग चरित्रों के साथ इस प्रस्तुति के माध्यम से एक कोशिश थी कि हम सब समझ सकें कि आखिर क्यों हमारा देश खुशी के सूचकांक में 118 वें स्थान पर हैं  ……………ओम शांति शांति  

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 20, 2016

    आदरणीय हरीश जी, बात किसी राजनीतिक पार्टी या व्यक्ति विशेष की कदापि नहीं है. हम परिवार और समाज में जिस भी चरित्र में हैं अपने उस चरित्र के साथ न्याय करना यदि सीख लें तो शायद समस्याओं के इस जाल से छुटकारा मिल सकता है. ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद – ॐ शांति

के द्वारा
April 20, 2016

आदरणीया वंदना बरनवाल जी ! सत्य और व्यंग्य से परिपूर्ण अतिसुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन ! वस्तुतः देश की यही स्थिति है ! इस भ्रष्ट मकड़जाल से निकलना अब असम्भव नहीं तो कठिन तो जरूर है ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की हार्दिक बधाई ! मंच पर एक बहुत अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 20, 2016

    आदरणीय महोदय / महोदया ……. धन्यवाद, यह ब्लॉग दरअसल ब्लॉग की दृष्टि से नहीं लिखी बस जो कुछ हर दिन देख रही हूँ उसी को लिख बैठी. सत्यता तो यही है कि जाल भी हमारा, फंसे हुए भी हम ही. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

    sadguruji के द्वारा
    April 21, 2016

    आदरणीया वंदना बरनवाल जी ! अपने कमेंट में नाम लिखना भूल गया था ! आपको बहुत बहुत बधाई !

Shobha के द्वारा
April 20, 2016

प्रिय वंदना पहले तो उत्तम लेख के लिए सम्मानित किये जाने पर बधाई आप ने नागरिक आये दिन जिन समस्याओं से जूझते हैं सुंदर ढंग से उनका वर्णन किया है | आज के राज नेताओं की और सबका ध्यान खींचा है नेता सुधर जाएँ अन्य समस्याएं भी ठीक कर लेंगे

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 20, 2016

    आदरणीया शोभा जी, इतने लम्बे ब्लॉग पर आपने समय दिया, धन्यवाद आपने उचित कहा कि नेता सुधर जाएँ तो अन्य समस्याएं भी ठीक कर लेंगे पर साथ ही एक बात और कि वे भी तो हमारे और आपके बीच से ही हैं और उन्हें नेता हमने और आपने ही बनाया है .

Jitendra Mathur के द्वारा
April 20, 2016

क्या खूब लिखा है वंदना जी आपने ! आँखें खोल दीं ! आईना दिखा दिया ! साप्ताहिक सम्मान के लिए हार्दिक बधाई और इस उत्कृष्ट आलेख के लिए हार्दिक अभिनंदन आपका ।

    Vandana Baranwal के द्वारा
    April 20, 2016

    आदरणीय जितेन्द्र जी, ब्लॉग पर आने एवं बधाई के लिए धन्यवाद. शिकायत सबकी एक जैसी ही है पर कोई भी बदलने को तैयार नहीं. एक बार पुनः धन्यवाद

Vandana Baranwal के द्वारा
April 22, 2016

आदरणीय सदगुरु जी धन्यवाद


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