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एक श्रेष्ठ बालक का निर्माण सौ विद्यालयों को बनाने से भी कहीं बेहतर है

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आधुनिक जीवन शैली में जब कभी भी संस्कारों की बातें की जाती हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई उपदेश दे रहा हो. किसी के पास भी फुर्सत नहीं है यह सोचने के लिए कि कल की इमारतों के लिए संस्कारों की आज जो नींव डाली जा रही है उन इमारतों में परिस्थियों से लड़ने के लिए कितनी मजबूती और क्षमता है. पर यही संस्कार हमारी महान भारतीय संस्कृति की पहचान भी है और विरासत भी. एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2020 तक भारत विश्व का सबसे युवा देश होगा और उन युवाओं के कन्धों पर देश इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना करेगा. इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि बाल सुलभ मन में और साथ ही उनकी सोच में भी संस्कार इस प्रकार से डाली जाए कि वही संस्कार उनका स्वभाव बन जाए.


समय के साथ बहुत सी परिभाषाएं बदल रही हैं, लोगों का आहार, विहार, व्यवहार और विचार सब बदलता जा रहा है बावजूद इसके यदि गौर किया जाए तो अनेकों बदलावों के पश्चात भी भारतीय दर्शन और भारतीय परम्पराएँ अपनी पूरी वैज्ञानिकता और प्रमाणिकता के साथ भारत के लोगों का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का भी किसी ना किसी रूप में पथ प्रदर्शन कर रही हैं. यही खासियत है हमारी भारतीय संस्कृति और संस्कारों की.


16-02-08_0816भारतीय दर्शन में तो जन्म से लेकर मृत्यु तक जो भी क्रियाएँ होती हैं उन सभी को संस्कार से जोड़ा गया है इसीलिए यहाँ जन्मा हर बच्चा स्वतः ही संस्कारित होता है बस आवश्यकता होती है समय के साथ उसे निखारने की. प्रारंभ में बच्चे का मस्तिष्क एक कोरे स्लेट के समान होता है जिस पर जो कुछ भी लिखा जाता है बस वही उसके मानस पटल पर अंकित हो जाता है. अतः ऐसे में माता-पिता की भूमिका बहुत अहम होती है. बच्चा जैसे ही चलना, बोलना और समझना सीखता है वैसे ही उसका दाखिला शिक्षण संस्थान में करवाया जाता है पर बावजूद इसके बच्चे के व्यक्तित्व के निर्माण की प्रथम पाठशाला तो उसका घर ही है.

बच्चे वे कलियाँ हैं, जो फूल बन जगत में अपनी खुशबू बिखराएंगें.
बच्चे वे कच्ची मिटटी हैं, जो गढ़ने पर देश, समाज और राष्ट्र बन जायेंगें।


भारत में शिक्षा के लिए गुरुकुलों की वयवस्था हुआ करती थी जहाँ गुरुजन निःस्वार्थ पठन-पाठन का कार्य करते थे पर आज अधिकांशतः शिक्षक रोजी-रोटी के लिए ही शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ते हैं जिसमें कोई बुराई नहीं है. पर जैसी प्राथमिकता वैसा ही कर्म. ना भूलें कि अर्थ यदि महत्वपूर्ण है तो शिक्षार्थ उससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसी प्रकार माता-पिता की प्राथमिकतायें भी बदल रही हैं, वे बच्चे के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं में निवेश का कोई प्रयास नहीं छोड़ना चाहते. ऐसे में स्वामी विवेकानंद की ये पंक्तियाँ बड़ी ही प्रासंगिक हैं कि बच्चों पर निवेश करने की सबसे अच्छी चीज है अपना समय और अच्छे संस्कार. ध्यान रखें कि एक श्रेष्ठ बालक का निर्माण सौ विद्यालयों को बनाने से भी कहीं बेहतर है.


संस्कार की पाठशाला के प्रथम गुरु माता-पिता ही हैं और उन्हें चाहिए कि बच्चे को स्वयं के समय और अच्छे संस्कार दोनों से ही सिंचित करते हुए उनके जीवन के सफ़र में हमसफ़र बनें. माता-पिता और गुरु के साथ ही बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षणिक माहौल भी बहुत ही निर्णायक भूमिका अदा करते हैं, अतः अभिभावकों के साथ ही स्वयं बच्चे को भी सजग और चौकन्ना रहना होगा. उम्र के साथ-साथ शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव भी शुरू हो जाते हैं, मित्रमंडली का दायरा बढ़ता है. अतः बच्चे के साथ उसके माता-पिता एवं शिक्षक का दोस्ताना तालमेल होना भी आवश्यक है.


100_2471विद्यार्थी जीवन में स्वयं बच्चे का अपना निर्णय भी उसके जीवन को प्रभावित करता है और इसके लिए आवश्यक है उसका अनुशासन प्रिय होना. बचपन से लेकर युवा होने के रास्ते में अनेकों प्रकार की कठिनाइयाँ और रुकावटें भी आती रहती हैं अतः यदि अनुशासन का साथ नहीं छूटे तो दिग्भ्रमित होने से अपने आपको बचाया जा सकता है. याद रखें एक माली अपनी बगिया के सभी पेड़-पौधों की सामान प्रकार से देखभाल करता है पर फल और फूल सभी पेड़-पौधों में एक समान नहीं होते हैं. ऐसे में अनुशासन का पाठ ही सही रास्ता दिखाता है और योग दर्शन का प्रथम सूत्र ही है अथ योगानुशासनम. अतः बच्चों को योग के प्रयोग के बारे में भी जागरूक करें.


किशोरवय के बच्चे स्वभाव से ही सीखने के लिए प्रेरित रहते हैं, उनमें सीखने की अपूर्व क्षमता होती है, उनके तन-मन में अपार उर्जा भरी होती है. उनके प्रश्न विविधता लिए हुए होते हैं जो तर्क के साथ ही कारण युक्त भी होते हैं. जिज्ञासाओं के शांत नहीं होने पर वे व्यक्तिगत स्तर पर विभिन्न तरीकों से भी जानकारियां जुटाते हैं, वे जैसा अनुभव करते हैं उसे प्रयोग में लाने की कोशिश भी करते हैं. उनका अनुभव, उनके प्रयोग और फिर प्रयोगों का परिणाम सही दिशा में हो इसके लिए उनके आस-पास का माहौल सकारात्मक होना चाहिए. बच्चों को अनावश्यक डांटना, उनके प्रश्नों का कल्पनात्मक समाधान प्रस्तुत करना उनके विकास पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं. जैसे सीमेंट शुरूआती अवस्था में ही पानी की अपेक्षा रखता है और अपेक्षित समय में पर्याप्त तराई नहीं होने के कारण उसमें मजबूती नहीं आती भले ही बाद में उस पर कितना पानी डाला जाये. बचपन भी बिलकुल ऐसा ही है अतः समय रहते ही अच्छे संस्कारों से इसकी सिंचाई करनी होती है.

हमारे परिवेश का बच्चों रखना तुम ख़याल..

क्योंकि कल तुम्हारी बदौलत ही यह देश बनेगा समर्थ और विशाल….

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 2, 2015

पूर्णतः सही हैं आपके विचार । बच्चे खिलकर सुगंधित पुष्प बनें, इसके लिए अभिभावकों को उन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं देने से अधिक उन्हें अपना समय देकर उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र-निर्माण पर ध्यान देना चाहिए । अभागे होते हैं वे बालक जिनकी प्रतिभा और गुणों को विकास हेतु उचित वातावरण एवं प्रोत्साहन नहीं मिल पाता और जिनके लिए किसी शायर ने अत्यंत पीड़ा के साथ कहा है - ’हसरत तो उन गुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गए’ । अच्छे संस्कारों से इन कोमल पादपों की सिंचाई करना माली रूपी अभिभावकों और साथ ही अध्यापकों का नैतिक कर्तव्य है ।

    Vandana Baranwal के द्वारा
    February 19, 2016

    आदरणीय जितेन्द्र जी, कुछ व्यस्तता के कारण मैं काफी समय बाद ब्लॉग पर आ सकी इसलिए उत्तर देने में विलम्ब हुआ. क्षमा करेंगे. विचार अच्छे लगे, बिलकुल सही कहा आपने कि माली की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. ज्वलंत उदाहरण जेएनयू के रूप में मौजूद है. सहमति और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद


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