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चोर बैठा है कहाँ

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चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं ज़फ़र, या कोई और भी कमरा है मेरे कमरे में, ज़फ़र गोरखपुरी कि मशहूर पंक्तियाँ हैं..


पिछले कुछ वर्षों से और विशेष तौर पर यूपीए सरकार के कार्यकाल से भ्रष्टाचार की बातें चरम पर हैं. संसद से लेकर सड़क तक, टीवी से लेकर अख़बार तक, सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी से लेकर व्यापारी तक सभी इस बहस में चोर-चोर चिल्लाते हुए शामिल जान पड़ते हैं, पर चोर कौन है, कहाँ है इसकी परवाह किसी को नहीं. सभी को यही लगता है कि चोर वही है जो स्टिंग में पकड़ा गया, आयकर के छापेमारी धरा गया, सतर्कता विभाग ने जिसे पकड़ लिया, ऑडिट में जो पकड़ा गया.

हालिया चुनावों में देश से कांग्रेस का पत्ता साफ़ करने में उसके शासन काल में हुयी बड़ी चोरियों और भ्रष्टाचार ने ही मुख्य भूमिका निभायी थी. स्वामी रामदेव, श्रीश्री रविशंकर जैसे संत भी मजबूर हो गए थे इस विषय पर अपना मत प्रकट करने को. योग ऋषि ने तो योग की मुहीम के साथ ही काले धन और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अनशन भी कर डाला तो वहीं अन्ना हजारे भी ताल ठोंक बैठे. एक समय तो ऐसा लग रहा था जैसे भारत की जनता देश से भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त करने को उतारू है.

समय बीता, लोक सभा और कई विधान सभाओं के चुनाव संपन्न हुए. कांग्रेस सिमटती चली गयी. नरेंद्र मोदी केन्द्र में तो अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में सत्तासीन हुए और साथ ही भाजपा ने कई प्रदेशों में वापस विजय पताका फहराई यहाँ तक कि जम्मू जैसे राज्य में उसे पहचान मिली. भाजपा का चेहरा बन चुके मोदी गुजरात से ही अपने आपको सिद्ध कर चुके थे और उनकी सिद्धि एवं साथ ही संत समाज के आशीर्वाद तथा जनता के वोटों ने उन्हें पूर्ण विश्वास के साथ देश के शीर्ष संवैधानिक पद पर बिठा दिया. कांग्रेस ऐसी सिमटी कि उनके उपाध्यक्ष ढूंढें नहीं मिल रहे हैं.

निश्चित रूप से जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं तब से अब तक शीर्ष स्तर पर किसी घपले या घोटाले की कोई खबर ब्रकिंग न्यूज़ बनकर नहीं आ रही है. नो न्यूज़ इज गुड न्यूज़, अतः कहना ठीक ही होगा जनता का चुनाव गलत नहीं है. हाँ यदा-कद कुछ उल्टे-पुल्टे बयान अवश्य आ जाते हैं जिन्हें अनदेखा कर दिया जाना ही श्रेयस्कर है.

बात चल रही थी चोर और चोरी की, तो मैं अकसर सोच में पड़ती हूँ कि क्या सिर्फ शीर्ष व्यापारी, शीर्ष अधिकारी या नेता ही चोर हैं या फिर ज़फ़र गोरखपुरी कि पंक्तियों के अनुसार चोर कहाँ बैठा है, ढूंढ हम बाहर रहे हैं, कहीं वो हमारे भीतर ही तो नहीं घर कर गया है?

आज हमारे प्रधानमंत्री स्वयं को प्रधानमंत्री नहीं बल्कि  देश का प्रधान सेवक मानते हैं परन्तु मैं उन्हें इसके साथ ही प्रधान मार्गदर्शक की भूमिका में भी देख्री रहती हूँ. आज भले ही उनके राजनीतिक विरोधी उनकी आलोचना कर रहे हों पर मन ही मन वे भी यह मानते होंगे कि लगभग तीन सौ दिनों के अपने कार्यकाल में उन्होंने कहीं बेहतर कार्य किया है, कई बेहतर सुझाव दिए, कई बेहतर विकल्प उपलब्ध करवाए हैं. जहाँ एक तरफ सरकारी योजनाओं का आर्थिक लाभ सीधे जरूरतमंदों के पास पहुंच सके इसके लिए उन्होंने लोगों के बैंक खाते खुलवाने की जोरदार पहल की तो वहीं देश और देशवासी स्वस्थ हों इसके लिए स्वच्छता अभियान और फिर योगमय भारत पर जोर दिया. इन सबके बाद अब वे अपने पिछले कुछ उदबोधनों में सांसदों, विधायकों एवं आर्थिक तौर पर सक्षम लोगों से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उर्जा और पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दे रहे हैं.

सब्सिडी छोड़ने की उनकी अपील पर कुछ लोगों ने इसे छोड़ने की पहल शुरू भी कर दी है. यद्यपि ऐसे लोगों की प्रतिशतता और इसकी रफ़्तार बहुत ही कम रहने की उम्मीद है बावजूद इसके एक सर्वाधिक लोकप्रिय नेता का ऐसा आहवान एक सकारात्मक शुरुआत है. हालाँकि यहाँ एक संशय शेष रह जाता है कि आर्थिक रूप से सक्षम होने की परिभाषा क्या है क्योंकि लाभ का अवसर कोई नहीं चूकना चाहता. भगवत गीता में कहा गया है कि आवश्यकता से अधिक एकत्र करने वाला प्रत्येक व्यक्ति चोर है, पर गीता तो लाल कपड़े में लिपटी हुयी घरों में कैद हो गयी है. पर हाँ सत्य तो यही है कि देश के समुचित विकास के लिए सब्सिडी आदि के लाभ हों  या आरक्षण के  लाभ, जो वर्ग और समुदाय सक्षम होते जा रहे हैं, यह उनकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि वे स्वयं इस दिशा में पहल करते हुए आगे आएं और इसके लिए पहले मैं की भावना को दुर्बल करते हुए पहले मेरा देश की भावना को प्रबल करें.

पर आज देश की जो स्थिति बन चुकी है उसमें ऐसी सोच के लोगों का मिल पाना क्या इतना आसान है? दरअसल भ्रष्टाचार और चोरी की आदतें  केवल किसी नेता या सरकारी व्यक्ति में ही नहीं है बल्कि यह तो आमजन की सोच में बुरी तरह घुल-मिल चुकी है इसीलिए यदि उस चोर को ढूँढना है तो ज़फ़र गोरखपुरी की पंक्ति को फिर से ध्यान से पढ़िए – चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं ज़फ़र, या कोई और भी कमरा है मेरे कमरे में, और फिर ढूंढिए उसे अपने भीतर भी.

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