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Vandana Baranwal


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योगं शरणं गच्छामि

Posted On: 19 Jun, 2016  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आइये आईने के सामने खड़े हो जाएँ……..

Posted On: 5 Mar, 2016  
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Politics lifestyle social issues में

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सौ प्रतिशत गारंटी

Posted On: 19 Feb, 2016  
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Entertainment Hindi News social issues में

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उर्जावान युवा भारत

Posted On: 20 Sep, 2015  
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Career Others Others Politics में

21 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

वे किसी को कुछ और तो नहीं दे सकते लेकिन सुबह से शाम कड़ी मेहनत करते हुए दूसरों को मेहनतकश और ईमानदार बनने की सीख अवश्य देते हैं. यह उन्हीं की मेहनत का कमाल है जो आज हम बहुमंजिली इमारतें, शॉपिंग मॉल, मेट्रो और हाईवे का आनंद ले पा रहे हैं, मोटरगाड़ियों में घूम पा रहे हैं और खुद का बोझ उठाने से बचे हुए हैं. उनका नियोक्ता हर दिन बदल जाता है क्योंकि उसे भी नहीं पता होता कि कल जब वो चौराहे पर खड़ा होगा तब कौन आएगा उससे उस दिन काम करवाने और दिहाड़ी देने। त्यौहार या छुट्टी का मतलब उस दिन की दिहाड़ी गयी और मैं चली थी पूछने कि आज तो तुम्हारा दिन है, ‘श्रमिक दिवस क्यों नहीं मनाया’? बहुत सुन्दर विचार के साथ आपका सदः हुआ आलेख प्रशंसनीय तो है ही, साप्ताहिक सम्मान की बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: deepak pande deepak pande

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: abhishekpiano1 abhishekpiano1

दिल्ली चुनाव में भाजपा की ज़बरदस्त जीत .....वाह ! क्या बात है शेर तो शेर ही होता है ...चाणक्य और चन्द्रगुप्त की जोड़ी (मोदी जी और अमित शाह ) पुनः हिट हो गई .कितने दूरदर्शी हैं दोनों .एक नवीन राजनितिक इतिहास में कुछ और पन्ने जुड़ गए .करें वास्तव में नए सूर्य की किरण हैं.जमीनी स्तर पर स्वच्छता अभियान ,बेटी बचाओ अभियान ,ने आम जनता को राजनेता के कितना करीब ला दिया है यही तो है सही जननीति .अरविन्द तो बस बड़बोले हैं झूठे वादे पंगु इरादे ...जनता को दिग्भ्रमित करते हैं . बस ऐसा ही कुछ चारों ओर सुनाई देता गर आप पार्टी की जगह बीजेपी चुनाव जीत गई होती रंजना जी सच लिखा आपने दुनिया सफलता का ही गुणगान करती है.जब कोई असफल होता है उसका हर फैसला हाव भाव सवालों के घेरे में होता है . साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

ब्लॉग बुलेटिन की शनिवार ०९ अगस्त २०१४ की बुलेटिन -- काकोरी कांड के क्रांतिकारियों को याद करते हुए– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें. सादर आभार!

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

खैर इस दो सौ बहत्तर के आंकड़े के लिए कुछ भी करने का परिणाम हाल की कुछ घटनाओं से समझा जा सकता है जैसे छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं की नक्सलियों द्वारा हत्या, कांग्रेसी सदमे में और लोग सकते में, लोगों ने कहा यह झटका है देश के लोकतांत्रिक ढाँचे पर. वही लोग इस जोर के झटके से उबर नहीं पाए थे कि अचानक आईपीएल की ख़बरें चिराग के जिन्न के समान प्रकट हुईं, देश भौंचक्का रह गया. लोगों को अहसास हुआ कि वे मंहगे टिकट खरीदकर स्टेडियम के भीतर क्रिकेट का कोई खेल देखने नहीं आये हों बल्कि वहाँ तो मदारी का खेल चल रहा है जहाँ अतिविशिष्ट दर्शक दीर्घा में बैठे मदारी अपनी मनमर्जी से जब चाहे गेंद पर सिक्सर और नो बाल करवा सकते हैं और पोल खुलने पर दर्शक को सकते में डाल सकते हैं. मोहल्ले में जब मदारी तमाशा दिखाने आता था तो डमरू की आवाज से ही पूरे मोहल्ले के बच्चों को पता लग जाता था कि मदारी अपना खेल दिखाने आ गया है और बन्दर-बंदरिया उसके इशारे पर नाचेंगे, पर यहाँ तो डमरू की आवाज ही नहीं आयी, किसके कहने पर किसने और क्या खेल दिखाया, इसे जब हमारी सरकारी और पुलिसिया तंत्र ही ठीक तरह से नहीं समझ पा रही है बहुत रोचक तरीके से आपने अपनी बात लिखी है आदरणीय वंदना बरनवाल जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

कुटिल राजनीतिज्ञों ने तो यह ठान लिया है कि वे देशवासियों को राजनीति के ऐसे चौराहे पर ले जाकर खड़ा कर देंगे जहाँ से उन्हें कभी कोई रास्ता ही नहीं सूझे शायद इसीलिए कभी मोदी बनाम राहुल शुरू किया जाता है तो कभी मोदी बनाम नीतिश शुरू हो जाता है और मोदी बनाम सुषमा. गौर करने योग्य इसमें यही है कि इन सब नामों में एक नाम बार-बार आ रहा है और वो है नरेंद्र मोदी. अर्थात मोदी ही फिलहाल एक अकेले ऐसे योद्धा हैं जिन्हें यूपीए और राजग की लड़ाई में भी फ्रंट पर रखा गया है, राजग की अपनी लड़ाई में भी उन्हें ही फ्रंट पर रखा जा रहा है और भाजपा की अंदरूनी लड़ाई में भी उन्हें ही फ्रंट पर लाया जा रहा है. इसका मतलब तो यही है कि मोदी को हर दिशा में एक लड़ाई लड़नी पड़ेगी क्योंकि संत समाज को भी वे स्वीकार्य हो चुके हैं. यही नहीं गुजरात में लगातार तीन चुनावों को जीतकर हर वर्ग में अपनी स्वीकार्यता साबित भी कर चुके हैं और गुजरात विकास के माडल का लोहा भी मनवा चुके हैं.बात निकली है तो दूर तक जायेगी ! इतिहास रचना तो नहीं लेकिन हाँ , इतना जरुर कहा जा सकता है की न केवल हिंदुस्तान की जनता बल्कि विश्व ये मानकर चल रहा है की आने वाला समय भारत में नरेन्द्र मोदी का ही है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

वन्दना जी, एक बहुत सार्थक, भावात्मक लेख जो आगे चलकर इतिहास के पन्नों में भी स्थान ले सकता है ! आज चारों ओर से जनता का हर वर्ग राजनीति गलिहारों से अलग प्रजातांत्रिक आवरण में लिपटा समाज द्वारा मोदी की उम्मीदवारी का जिस तरह समर्थन कर रहा है उस समर्थन का कांग्रेस के दिग्गजों के दिल और दिमाग में एक नया केमिकल रिऐक्शन हो रहा है ! वे खौप खाए हुए हैं ! कल अगर मोदी प्रधान मंत्री बन गए तो उनके काले कारनामे, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, काला धन जमा खोरी की फाईलें खुलने लगेगी और फिर उन्हें जेल की काली कोठारी में जाना पडेगा ! उन्हें दिन में समाचार पत्रों में और रात स्वपनों में मोदी ही नजर आ रहे हैं ! एस पी, बी एस पी, कम्युनिस्ट लालू, ममता और वे सारी क्षेत्रीय पार्टियां जो धर्म निरपेक्ष का अर्थ अपनी सुविधा के लिए मुस्लिम जनता को खुश करने तक सीमित रखना चाहते है उनके भी मोदी के बढ़ते हुए प्रभाव से होश गुम हो रहे हैं ! देश की हवा आज नरेन्द्र मोदी के हक़ में चल रही है ! आपके लेख ने इसमें और मशाला भर कर मोदी जी की राह और आसान कर दी है ! बहुत सारी बधाई !

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

भाजपा साम्प्रदायिकता है या कांग्रेस या फिर सपा ये तो उनके नेता जब अपने दिलों पर हाथ रखकर स्वयं से पूछें तो भी शायद वे समझ नहीं पायेंगे लेकिन एक बात तो तय है कि भारतीय राजनीति का पतन उम्मीद से कहीं ज्यादा हो चुका है जहाँ आज राष्ट्र धर्म जैसे विषय दो कौड़ी के होकर रह गए है. राजनीति का अपना गुण धर्म होता है परन्तु पता नहीं क्यों यह अपने साथ नकारात्मक गुणों को ज्यादा समेटे हुए है. जैसे अग्नि का स्वभाव झुलसा देना है और पानी का स्वभाव नीचे की ओर बहना है कुछ उसी तरह भारतीय राजनीति का अपना एक स्वाभाव बन गया है एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहने का और अनर्गल बयान देने का. महात्मा गाँधी ने कहा था कि नियम यदि एक क्षण के लिए टूट जाये तो सारा सूर्यमंडल अस्त-व्यस्त हो जाए परन्तु फिलहाल तो भारतीय राज नीति में कोई नियम धर्म नहीं ह मोदी इस देश का भविष्य हैं ! सार्थक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आज देश के शीर्ष पर बैठे लोगों के कारण देश की वाह्य और आंतरिक दोनों ही स्थिति असहज होती जा रही है. देश की अंदरूनी समस्याएं हो या फिर सीमा पार की समस्याएं हों, भारत की आम जनता अपने नेताओं के खोखले बयानों और आश्वासनों से बुरी तरह आजिज आ चुकी है. पाक के इरादे, आतंकवादियों के इरादे, नक्सलियों के इरादे, माओवादियों के इरादे, भ्रष्टाचारियों के इरादे, बलात्कारियों के इरादे इन सभी के इरादे नापाक हैं ये भारत की आम जनता भी जानती और समझती है पर सरकार और नीति निर्धारकों की रणनीति ऐसे नापाक इरादों से निपटने के लिए पाक है या वह भी पूरी तरह से नापाक हो चुके हैं, सीमाओं के प्रहरी, उनका परिवार और भारत की आम जनता अब इसे भी समझना चाहती है.पाकिस्तान का जन्म ही भारत विरोध से हुआ था ।हम चाहे लाख कोशिशें कर लें पर पाक कि नापाक हरकतें न कभी बंद हुई थी और न होंगी।हमारे नीति नियंता आज तक पाक के खिलाफ कभी भी वोट बैंक के चलते सख्त कदम उठाने से गुरेज करते रहें हैं ।पाक को जब तक करार जवाब नहीं मिलेगा वह सुधर नहीं सकता है।सार्थक और सटीक लेखन दिया है आपने !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

स्वतः स्फूर्त होकर उमड़ते जन सैलाब और लोगों का आक्रोश देखकर यह तो तय है कि आम भारतीय लुंज पुंज कानून के कारण दिनोदिन बढती कुव्यवस्थाओं से बुरी तरह तंग आ चुका है और उसकी सहनशीलता जवाब दे रही है. आज भले ही वह किन्हीं कारणों से अपनी इस लड़ाई को लम्बी पारी में नहीं बदल पा रहा है पर वह दिन दूर नहीं है जब सत्ताओं में बैठे लोगों को इसका अहसास भी हो जाएगा कि जनता भी लम्बी पारी खेल सकती है और केवल वोट की राजनीति अब नहीं चलने वाली. शायद वक़्त आ गया है कि हमारे नेता अपनी आँखों से जनता को केवल वोट की तरह देखने वाला अपना राजनीतिक चश्मा उतार लें और आम भारतीय की सोच और समझ को ध्यान में रखते हुए अपने निर्णयों पर गौर करें. दिलासा और बयानबाजी राजनीति के दांव-पेचों को नहीं समझ पाने वाले लोगों को बहलाने और फुसलाने का एक तरीका मात्र हो सकता है परन्तु किसी समस्या का समाधान नहीं. गृह मंत्री का यह कहना कि मामले में न्यायिक आयोग बनाया जाएगा भारत की न्यायिक प्रक्रिया को आइना दिखाने के लिए पर्याप्त है. लगता है परिवर्तन अवश्यम्भावी है किन्तु कब होगा ये देखना होगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय वंदना जी, सादर अभिवादन! सरकार अगर समझ गयी होती तो आज लाठी चार्ज नहीं होता महिलाओं के हाथ,पैर और सर नहीं फूटते ... सरकार अगर समझ गयी होती तो संसद का विशेष अधिवेशन बुलाकर नया कानून पास करा सकती थी. सरकार अगर समझ गयी होती तो दिन रात अदालत की कार्रवाही चलाकर फैसला सुना सकती थी.... पर इतनी कमजोर ब्यवस्था से हसाब क्या आशा कर सकते हैं. सर्कार बदल कर भी हम क्या कर लेंगे वही लोग पार्टी बदलकर आ जायेंगे और परिणाम के लिए आम आदमी "हाड कंपकपाती ठण्ड में रैन बसेरों की और हसरत भरी निगाह से देखता रह जायेगा.... फिर भी हमें आश नहीं छोड़नी चाहिए! देखे क्या होता है ? सभी आंदोलनों का हस्र हम देख ही चुके हैं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

आदरणीया वंदना जी, सादर अभिवादन! आपके विचारों का पूरी तरह से सम्मान करते हुए एक दो शब्द कहना चाहूँगा-इतने सालों बाद भी हम भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस का विकल्प पैदा नहीं कर पाए .. इसमे क्या हमारा दोष नहीं है. ... अच्छे और ईमानदार बुद्धिजीवी, राजनीति में इसलिए नहीं जाना चाहते कि राजनीति बड़ी गंदी चीज है! बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की सारी शक्ति छिन्न-भिन्न हो गयी. अरविन्द केजरीवाल अभी तक अपने कुछ साथियों के बदौलत मैदान में डंटे हुए हैं, पर उन्हें भी तोड़ने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है. उनके साथ और ज्यादा लोग नहीं मिल रहे हैं. कांग्रेस हर क्षेत्रीय दलों को येन केन प्रकारेण अपने साथ मिला लेती है. भाजपा एक मजबूत दल या संगठन के तौर पर नहीं उभर पा रही है. उनके अन्दर भी अन्तर्विरोध चल रहा है! हम वोट डालने नहीं जाते और जाते भी हैं तो जाति-धर्म के नाम पर वोट देकर चले आते हैं. .... और भी बहुतेरे सवाल हैं जो आप भी भलीभांति जानती हैं. फिर भी आपके विचारों का सम्मान करते हुए ... यही कहना चाहूँगा कि पर्दा हटना चाहिए ... हर जगह से, सड़क और दफ्तरों में भी अन्याय का विरोध होना चाहिए! देश का भला हम तभी कर सकेंगे जब अपने आस पास के परदा को हटाने में कामयाब हो जायेंगे!....आभार सहित और क्षमा भी चाहूँगा अगर कुछ ज्यादा लिख गया हूँ तो!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

इसके लिए निश्चित रूप से धन्यवाद देने चाहिए योग गुरु स्वामी रामदेव और समाजसेवी अन्ना हजारे एवं साथ ही नयी राजनीतिक पार्टी का गठन कर चुके अरविन्द केजरीवाल को भी, जिनके प्रयासों से समाज के कई तबके के लोग जागरूक नजर आने लगे हैं जिनमें अधिकारी से लेकर चपरासी तक, व्यापारी से लेकर उपभोक्ता तक और यहाँ तक कि घरों में बंद मात्र चूल्हों चौकों तक सीमित रहने वाली गृहिणियां भी. यह एक शुभ संकेत है भारतीय लोकतंत्र के लिए जिससे भ्रष्ट व्यवस्था के अनंत आनंद में डुबकी मार रहे लोगों के आनंद में खलल पड़नी तो शुरू हो ही चुकी है. लेकिन वंदना जी , जिस कौम को अपने वोट kii कीमत ही पता न हो , वहां ये लोग बेचारे अपने आप को कितना भी बर्बाद करें , कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ! लेकिन फिर भी भगवान् से प्रार्थना है की ये लोग अपने कार्य में सफल हों !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

वर्तमान राजनीति, विसंगति और भावी संकेत पर प्रभावी आलेख; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ ! "वैसे कांग्रेस में वफादारी का ईनाम हमेशा से उम्दा मिलता रहा है जिसके उदाहरण कुछेक राष्ट्रपति तक हैं और राज्यपालों की तो कोई गिनती ही नहीं है. आज जब कांग्रेस के लोग अपने नेता के लिए ही नहीं बल्कि उनके अध्यक्षा के दामाद पर भी उँगली उठने पर जान दे देने की बात करते हैं तो वे भला ऐसे कांग्रेसी ईनाम के हकदार क्यों नहीं होंगे, इतनी श्रद्धा तो भगवान में भी नहीं होती. इसलिए मंत्रिमंडल के फेरबदल को बहस के विषय में लाने से समय और उर्जा दोनों ही व्यर्थ हो रही है, क्यों, क्योंकि यह फेरबदल किसी के श्रद्धा, किसी के विश्वास, किसी के समर्पण तो किसी के नतमस्तक होने की आत्मकथा है.."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आदरणीया वन्दना जी, आप ने अत्यंत प्रासंगिक प्रश्न उठाए हैं -- "पश्चिमी सभ्यता को तेजी से अपनाते इस समाज का एक और नंगा चेहरा तेजी से सामने आ रहा है. अपने देश में, समाज में पुरुषों ने अपनी क्षणिक सुख के खातिर पत्नी बदलने का जो नया शगल अपनाया है यह औरत के शरीर ही नहीं बल्कि मन को भी छलनी करने का काम किया है. जिसके ऊपर सबसे ज्यादा विश्वास कर, सारे रिश्ते-नाते छोड़ कर एक लड़की आ जाती है वह भी उसे मात्र भोग की वस्तु समझता है यह जानकार छलनी होता उसका ह्रदय लेकिन जीवन को संघर्ष मानकर एक नए रूप में परिभाषित कर फिर से उठकर, कोशिश कर खड़ी हो चलती है |"साथ ही नेताओं के संदर्भित कथन पर गंभीर टिप्पणी भी की है: हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: jlsingh jlsingh

वन्दना जी आपका आलेख सर आँखों पर.विषय बेहद उपयुक्त .पर एक बात से सहमत नहीं हूँ अखबार में खबर ज्ञानवर्धक भी होते हैं.मैं जिस संसकरण की बात कर रही हूँ. उसमें स्थानीय जानकारे के साथ देश-विदेश की जानकारी भी होती है.और सबसे उम्दा होता है सम्पादकीय पृष्ठ जिसमें उर्जा कोलुमं में प्रत्येक दिन जीवन के अमूल्य सन्देश होते हैं जो कभी रद्दी का हिस्सा नहीं बन पाते . मेरा मानना है की समाचार पत्र सभी विषयों पर खबर देते हैं बस चलानी की तरह छानना और अपने समाज के लिए उसमें से अच्छी बातों को सीखना और गलत बातों से सावधान होना दूसरों को भी सचेत करना ज़रूरी है. जोश,झंकार,यात्रा जैसे विशेष पृष्ठ तो स्वयं में एक विद्यालय हैं जो कभी-कभी तो संकलन योग्य भी होते हैं इन्हें आपने कैसे अनदेखा कर दिया? खैर एक बार पुनः इन सभी दिनांक के पत्र के सभी पृष्ठ ध्यान पूर्वक पढ़ कर पुनः विचार करें यह मेरा निवेदन है. साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

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के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: Vandana Baranwal Vandana Baranwal

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

मेरे विचार से राजा के द्वारा कोई भी नियम या कानून बनाने का उद्देश्य यही होता है कि प्रजाजन परिपक्व बनें. इसके लिए विभिन्न कानूनों के जरिये आम जन को प्रथमतः एक मर्यादा में रखने का प्रयास होता है, और समानांतर रूप से उन्हें शिक्षित करने का कार्य भी किया जाता है. फिर उनके परिपक्व होते-होते कानूनों की कठोरता को शनैःशनैः अत्यंत शिथिल किया जाता है और अंततः उन्हें पूरी तरह से हटाया भी जा सकता है. बस एक यही शर्त या अपेक्षा होती है एक अच्छे राजा की कि प्रजाजन निरंतर परिपक्वता का परिचय देते रहें. दुर्भाग्य से हमारे भारत में शासक मात्र कानून बनाकर चैन से सोते रहे कि सब ठीक हो जाएगा, समानांतर रूप से समुचित व्यावहारिक शिक्षा एवं नैतिक गुणों के संवर्धन का कोई ठोस प्रयास सजीव उदाहरणों के माध्यम से शासकीय स्तर पर प्रभावी ढंग से नहीं हुआ, उसी की परिणति है यह कि आज भी हमें बच्चों की तरह विभिन्न प्रकार के कानूनी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है. शासन सहित हम आमजन भी अपनी-अपनी भूमिका में खरे नहीं उतर रहे हैं. भारत के राजा-प्रजा आदि कब तक शैशवावस्था में ही रहेंगे?

के द्वारा: सचेतक सचेतक

वंदना जी, आरक्षण केवल समाज के शोषित वर्ग के लिए था जिनके यहाँ की प्रतिभाये केवल छुआ-छूत और उंच-नीच और भेद भाव के कारण दबी रह जाती और समाज उन प्रतिभाओं के लाभ से वंचित रह जाता था. आज जब उंच-नीच और छुआ-छूत लगभग समाप्ति की ओरहै और समाज के लोग अस्पर्श्यता के नाम उन्हें रोक भी नहीं सकते है क्योकि शिक्षा और सभ्यता ने उनकी सोच परिवर्तित कर दी है अब दलित समाज की तमाम प्रतिभाएं निखर कर सामने आ रही है और वे आररक्षण की मोहताज़ भी नहीं है तो कुछ प्रतिभाओं के उत्थान के लिए शेष नाकारों को ढोने का क्या औचित्य है. प्रतिभाये तो उभर कर सामने आयेंगी ही. आरक्षण से हम नकारों की लम्बी फौज तैयार कर रहे है क्यों कि आरक्षण के कारण हम गुणवत्ता के साथ समझौता कर रहे है. अब आरक्षण गुणवत्ता के रक्षा के लिए समाप्त ही होना चाहिए. ये अलग बात है के वोट की राजनीती के चलते इसके आसार दूर दूर तक नहीं दिखते है.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

वंदना जी, आपकी पंक्तियाँ .....इसलिए बेहतर तो यही होगा कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना सकें जिससे कोई अशिक्षित नहीं रह जाये, हम रोजगार के इतने साधन उत्पन्न कर सकें कि कोई बेरोजगार नहीं रह जाये. हर किसान, हर श्रमिक जब शाम को घर लौटे तो उसके चेहरे पर कम से कम इतना संतोष अवश्य हो कि कल जब नया सूरज उगेगा तो उसके घर का कोई सदस्य भूखा नहीं रहेगा. प्रश्न तो यही है की ऐसी सामाजिक स्थिति हमें कौन सा दल देगा...तथा धर्म जाती के नाम पर यदि हमें राजनीतिक दल बाँट रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं की पूरी की पूरी जनता बड़ी भोली है जिसे सही गलत का अंदाजा नहीं....देश के प्रत्येक नागरिक को यह भी सोंचना समझना होगा की आखिर धर्म जाती पैदा कहाँ से हुए तथा हमें कब तक उन्हें अपने नाम से चिपका कर घूमना है...जिससे कभी भी कोई भी हमें धर्म जाती के नाम पर लड़ा सके.... असमानता ख़त्म करने की बहुत ज़रुरत है तथा यह असमानता हर स्तर से ख़त्म होनी चाहिए....चाहे वह शैक्षिक हो, आर्थिक हो, राजनीतिक हो, सामाजिक हो या फिर जाती और धर्म आधारित ही क्यों न हो.... सिर्फ हाँथ पर हाँथ धरे बैठने और राजनीति को कोसने से कुछ नहीं होगा, पहले हमें अपने नामों से यह जाती-धर्म सूचक शब्द हटाने होंगे...उसके बाद हम बाकी समानताओं के लिए प्रयास कर सकेंगे.... मैंने भी आरक्षण पर लेख लिखा है आपकी प्रतिक्रिया ज़रूर चाहूँगा http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/11/aarakshan/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: rajanbheem1 rajanbheem1

परन्तु वहाँ पहुँचने के पश्चात उनमें से अधिकतर नेता खास तौर पर सत्ता में बैठे लोग अपने आपको इतना ऊपर मानने लगे हैं कि उन्हें आम भारतीय बहुत ही तुच्छ नजर आने लगा है. क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ और कौन ये वो छः ईमानदार सेवक हैं जिन्हें एक सफल संगठन को सदैव अपने पास रखना चाहिए क्योंकि यही छः चीजें उस संगठन की नींव में हमेशा विराजमान रहती हैं. सत्ता के मद में चूर कांग्रेस ने इन चीजों को बड़े ही गलत तरीके से याद कर रखा है जिसकी झलकियाँ जब-तब उसके मंत्रियों, नेताओं और प्रवक्ताओं से मिल ही जाया करती हैं, ये तो अच्छा है की हमें पांच साल के बाद इन्हें बदलने का मौका मिल जाता है ,सोचिये अगर ये पूरे जीवन काल वहां होते तो क्या दशा और दिशा होती ? सार्थक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

वन्दना जी सादर नमस्कार, आपका स्वयं के प्रति या कहें इस बहाने सारे समाज के प्रति आक्रोश गलत नहीं है. मनुष्य स्वभावगत स्वार्थी है.किसी भी कतार में खड़े रहने पर उसे लगता है की सर्वप्रथम उसका ही नंबर आये.उसके आनंद में कोई खलल ना पड़े उसके मार्ग में कोई बाधा ना हो. किन्तु सभी जानते हैं की यह संभव नहीं है. किन्तु कुछ लोगों के इसे रुपयों के या शारीरीक बल के माध्यम से संभव करने की कोशिश की है उन पर कोई नियंत्रण नहीं होता देख अन्य लोग हताश हो गए और इसी का परिणाम है की अन्य लोग जो अनुशासित थे उनको भी लगा यह मार्ग ही उत्तम है. इसी तरह परिस्थिति में बदलाव आया और आज इसका भयंकर रूप हमारे सामने है जो की शायद अन्तिमता की तरफ अग्रसर है यदि अब भी नियंत्रण के लिए कारगर कदम नहीं उठाये गए तो समझो अराजकता का जो हाल होगा की फिर विनाश ही नजर आयेगा. आपके सार्थक आलेख के प्रति पूर्ण सहमति है.

के द्वारा: akraktale akraktale

संभवतः हिंदी या अंग्रेजी भाषा के वर्णमाला का कोई भी ऐसा अक्षर नहीं बचा होगा जिसके नाम से घोटाला न हुआ हो. आखिर भ्रष्टाचार का इस कदर बढ़ना देन किसकी है, इसका दोषी कौन है, क्या वही जिनके मान और सम्मान को इसके खिलाफ उठे शब्दों से ठेस पहुँच रही है? इन सवालों के उत्तर में हम और हमारी लेखनी भी शनैः शनैः मौन और खामोश बनती जा रही है और कब तक बनी रहेगी इसका पता नहीं. वास्तव में तमाशा करने वाले तो चंद लोग ही होते हैं और तमाशे को देखकर तालियाँ बजाने वाले ढेरों पर घोटालों का ये जो तमाशा हमारे देश में शुरू हो चुका है उस पर तालियों की उम्मीद कौन लोग कर रहे हैं?. केवल तमाशबीन बनकर भीड़ के हिस्से बने रहने की इस आदत को छोड़ पाने में हमारी कौन सी बेबसी और झिझक है? बार-बार पूछ बैठती हूँ अपने आप से ये प्रश्न. आखिर कौन खोजेगा इसका समाधान? बढ़िया लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: अजय कुमार झा अजय कुमार झा




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